CLICK HERE : प्यार को जीवन में लाने से ही आयेगी जीवन में सुंदरता: निरंकारी सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज

HOSHIARPUR (ADESH, MANNA) प्यार शब्द के उच्चारण के साथ नहीं बल्कि प्यार को जीवन में लाने साथ ही जीवन में सुंदरता आयेगी। उक्त विचार निरंकारी सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज ने ओरगांबाद में हुए निरंकारी संत समागम दौरान प्रकट किये। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे चाय में शकर का केवल नाम ही ले लें और वैसे ही चमच घुमा दें तो चाय में मिठास नहीं आ सकती, चाय में मिठास लाने के लिए चाय में शकर डालनी भी ज़रूरी है। इसी तरह ही परमात्मा का नाम लेना ही काफ़ी नहीं है, इस परमात्मा को जानना भी ज़रूरी है। परमात्मा को जानने के बाद ही जीवन में प्यार, दया आदि समेत अन्य दैवी गुण जीवन में आ जाते हैं। परमात्मा का एहसास करते हुए जितना-जितना हम सिमरन करते चले जायेंगे तथा उतना-उतना ही हमारे जीवन के अवगुण जीवन में से ख़त्म होते चले जाएंगे और गुण आने शुरू हो जाएंगे। उन्होंने फरमाया कि जीवन को आनन्दायक बनाने के लिए प्यार को जीवन में लाना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने आगे फरमाया कि सत्संग में आने से मन निरंकार के साथ जुड़ता है, सिमरन होता है और सेवा समर्पित भाव के साथ होती है।

उन्होंने फरमाया कि मन में से नफऱत की भावनायों को निकाल कर प्यार की भावना जीवन में लेकर आनी है। नफऱत, वैर, विरोध के साथ मनुष्य का अपना मन ज़्यादा परेशान रहता है और वह दूसरे के लिए भी परेशानी का कारण बनता है लेकिन प्यार के भावना जितनी ज़्यादा मनुष्य के जीवन में आती है, जीवन में खुशियाँ और आनंद जहाँ अपने जीवन में आता है वहीं ही दूसरे के लिए भी खुशियाँ और चेहरे पर मुस्कारहट का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि संतों महापुरूषों ने हमेशा ही दिलों में विशालता लाने का ही सिखलाई दी है। संसार में अमन, एकता, समदृषिट वाली निगाह के साथ ही हरेक को देखना है। किसी के साथ भी नफऱत नहीं करनी है, उच्च नीच की भावना मन में नहीं रखनी है क्योंकि सभी में एक परमात्मा की अंश है, यदि सभी  में परमात्मा की ही अंश है तो नफऱत का कारण ही ख़त्म हो जाता है। उन फरमाय कि मनुष्य के शरीर को जब कोई रोग लगता है, बाज़ू  में दर्द होता है तो हम जल्दी ही चेतन होकर उसका उपाय करने की कोशिश करते हैं कि हमें दर्द से जल्दी आराम मिल सके। इसी तरह ही जो मन को रोग लगे हुए हैं कि मन सभी में अवगुण ही देखता है, इस रोग को मन में से निकालने के लिए भी हमें पूरी चेतनता के साथ उपाय करना चाहिए,इसका उपाय किस तरह हो सकता है, उसके लिए सेवा,सिमरन सत्संग और ब्रह्मज्ञान हासिल करने के साथ ही होगा।

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